रायपुर/गरियाबंद (दुनिया दस्तक): छत्तीसगढ़ में धान खरीदी के बाद अब उठाव (Transportation) को लेकर मचे घमासान ने प्रशासनिक अमले में खलबली मचा दी है। गरियाबंद जिले में धान उठाव की कछुआ चाल और खरीदी केंद्रों में धान के पहाड़ों जैसे लगे अंबार को गंभीरता से लेते हुए शासन ने सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की है। जिले के मार्कफेड जिला विपणन अधिकारी (DMO) किशोर चंद्रा को उनके पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है। 18 फरवरी की देर रात जारी आदेश के बाद उन्हें कबीरधाम जिला मुख्यालय अटैच कर दिया गया है।
क्यों गिरी गाज? आंकड़ों की जुबानी लापरवाही
गरियाबंद जिले में इस साल समर्थन मूल्य पर रिकॉर्ड धान की खरीदी की गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिले के विभिन्न केंद्रों में कुल 50.66 लाख क्विंटल धान की खरीदी हुई थी। लेकिन विडंबना यह रही कि खरीदी खत्म होने के काफी समय बाद भी अब तक केवल 29 लाख क्विंटल धान का ही उठाव मिलों या गोदामों तक हो सका है।
लगभग 21 लाख क्विंटल से अधिक धान अब भी खुले आसमान के नीचे केंद्रों में पड़ा हुआ है। शासन और कलेक्टर के बार-बार निर्देशों के बावजूद उठाव की गति में सुधार नहीं आने को ‘कार्य के प्रति घोर लापरवाही’ माना गया है।
बफर लिमिट से 6 गुना ज्यादा धान: जाम हुए केंद्र
जिले के कई खरीदी केंद्रों की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई थी। नियमों के अनुसार, प्रत्येक केंद्र की एक निश्चित ‘बफर लिमिट’ होती है, जिससे अधिक धान वहां नहीं रखा जाना चाहिए। लेकिन गरियाबंद के अधिकांश केंद्रों में तय सीमा से छह गुना ज्यादा धान जमा हो गया था।
इस ‘ओवरस्टॉक’ के कारण केंद्रों में पैर रखने तक की जगह नहीं बची थी। समितियों ने बार-बार जिला प्रशासन और मार्कफेड अधिकारियों को पत्राचार कर चेताया था कि यदि उठाव नहीं हुआ तो आगामी रख-रखाव और सुरक्षा में बड़ी चूक हो सकती है।
कलेक्टर की नाराजगी और 18 फरवरी की रात का वह आदेश
सूत्रों के अनुसार, गरियाबंद कलेक्टर ने धान उठाव की समीक्षा बैठकों में कई बार डीओ (Delivery Order) जारी करने और परिवहन में तेजी लाने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके, जमीनी स्तर पर मार्कफेड का प्रबंधन विफल साबित हो रहा था। कलेक्टर की कड़ी नाराजगी और शासन को भेजी गई रिपोर्ट के बाद, मुख्यालय ने सख्त एक्शन लिया।
बुधवार, 18 फरवरी की देर रात जारी आदेश में किशोर चंद्रा को गरियाबंद से हटाकर कबीरधाम (कवर्धा) भेज दिया गया। उनकी जगह अब नए अधिकारी की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, ताकि आगामी दिनों में उठाव की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके।

समितियों की बढ़ी मुसीबत: मौसम और चूहों का डर
धान का उठाव न होने से सबसे ज्यादा परेशान सहकारी समितियों के कर्मचारी हैं। केंद्रों में धान जमा होने से न केवल जगह की कमी हो रही है, बल्कि खुले में रखे धान पर असमय बारिश, नमी और चूहों द्वारा नुकसान पहुँचाए जाने का खतरा मंडरा रहा है। समितियों का कहना है कि यदि समय पर उठाव नहीं हुआ, तो सूखत (Weight Loss) का सारा बोझ उनके सिर पर आएगा, जिससे वित्तीय नुकसान की संभावना है।
Duniya Dastak का विश्लेषण: आखिर कहाँ हुई चूक?
यह कार्रवाई केवल एक अधिकारी के तबादले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन का उन सभी अधिकारियों को कड़ा संदेश है जो धान खरीदी जैसे संवेदनशील मामले में सुस्ती बरत रहे हैं। क्या मिलर्स के साथ समन्वय में कमी थी? या फिर परिवहन के लिए ट्रकों की व्यवस्था नहीं हो पाई? इन सवालों के जवाब अब नए अधिकारी को तलाशने होंगे ताकि किसानों के पसीने की कमाई (धान) सुरक्षित गोदामों तक पहुँच सके।
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